आवाहन - भाग 5
गतांक से आगे...
भावना, अगर मेरी कल्पना मात्र होती भी, तो भी मैं उसे प्रत्यक्ष कर नहीं सकता था या दूसरे शब्दों में कहें तो …स्थूल रूप नहीं दे सकता था, यूं भी इसके लिए कल्पना करना आवश्यक है ।
भावना से मेरी मुलाकात एक संयोग थी, संयोग….जो कि प्रकृति ने निर्माण किया था. खैर…..
सदगुरुदेव ने आगे बताया, "जैसे मैंने कहा कि मानव की विचार शक्ति न्यून है लेकिन ब्रह्मांड नहीं, इसी क्रम में हमने स्थूल और अस्थूल को अस्तित्व का नाम दिया है । विज्ञान की भाषा में कहें तो अणु ही अस्तित्व का निर्माण करता है जिससे घन प्रवाही वायु वगैरह का निर्माण होता है । पर अस्तित्व हीनता का क्या? अस्तित्व हीनता का भी कोई अस्तित्व होता है ?
शिव और शक्ति निरंतर गतिशील रहते हुए निर्माण को जन्म देते है । शिव स्थूल रूप हैं तो शक्ति आत्म रूप ।
शिव के अन्दर शक्ति है और शक्ति के वाह्य में शिव । अस्तित्व के क्रम में हमें शिव और शक्ति को समझना पड़ेगा । शिव का पूर्ण रूप शक्ति से सायुज्य है । मतलब कि, स्थूल रूप में शिव का अंश ज्यादा होने से वह पुरुष आकृति में दिखाई देते हैं पर शक्ति उनके अन्दर स्थापित होती ही है । शक्ति की बात करें तो शक्ति का जो स्थूल रूप है या जिसे चरम चक्षु से देखा जाता है उसका पिंड शरीर शिव से निर्मित मात्र ही है ।
यूं तो दोनों अपने आप में पूर्ण हैं, लेकिन एक दूसरे में समाहित होते हुए भी एक दूसरे से अलग हैं ।
अस्तित्व हीनता और अस्तित्व एक दूसरे में समाहित ही हैं लेकिन जहां पर जिस का भार बढ़ जाता है वही स्थूल रूप में उसका वाह्य आवरण नज़र आता है । इसका मतलब ये है कि पदार्थ के अन्दर उसका अस्तित्व ठोस रहता है । पत्थर बिना हिले ढुले कुछ नहीं कर सकते लेकिन उसके अन्दर की शक्ति देखनी है तो उठा के किसी के सर पर फेंके तो सर फोड़ देता है । तो फिर हम उसके अन्दर निहित शक्ति का अस्तित्व गिनें या शक्ति की अस्तित्व हीनता?
इसी लिए मैंने कहा कि हरेक पदार्थ में अस्तित्व और अस्तित्व हीनता सम्मिलित होती ही है ।
स्थूल जगत से सूक्ष्म जगत के बीच में अंतर कुछ भी नहीं है । जहां आप बैठे हैं वही स्थूल जगत है और वही सूक्ष्म जगत भी लेकिन, अगर आप में जल तत्व और भूमि तत्व है तो, आपके लिए सूक्ष्म जगत का अस्तित्व नहीं है और अगर जल और पृथ्वी तत्व का लोप हो गया तो फिर आपके लिए सूक्ष्म जगत का अस्तित्व है ।
इसी प्रकार से हरेक अस्तित्व में उसकी अस्तित्व हीनता है और हर एक अस्तित्व हीनता का अस्तित्व स्थूल रूप में भी होता है । वहां पर निर्माण की प्रक्रिया अणु विज्ञान से नहीं बल्कि ऊष्मा विज्ञान से होती है । और, जिस प्रकार से स्थूल और सूक्ष्म एक है, फिर भी अलग अलग है, ये जगत भी यही पर विद्यमान है जिसे "माया जगत" कहते हैं ।
मैंने प्रार्थना की कि माया जगत पर थोड़ा और प्रकाश डालें, तब उन्होंने कहा, "माया जगत में प्रकृति, निर्माण का कार्य, ऊष्मा से करती है । ऊष्मा को एक ठोस रूप देने पर वह पदार्थ में परिवर्तित हो जाती है लेकिन वह पदार्थ सिर्फ और सिर्फ उसी को दिखाई देता है जिसके लिए वो निर्मित हो । दूसरे शब्दों में वह निर्माण किसी एक उद्देश्य मात्र से होता है ।"
माया जगत में जाने पर अगर आपको प्यास लगी है तो पानी आपके सामने प्रकट हो जाएगा पर आपके मित्र को भूख लगी है तो उसके सामने खाद्य पदार्थ आ जाएगा । आपके लिए खाद्य पदार्थ का अस्तित्व नहीं होगा और आपके मित्र के लिए पानी का अस्तित्व नहीं होगा ।
भ्रम और अस्तित्व के बीच में जो पर्दा है, उसे जिस जगत पर हटा दिया जाता है उसे ही माया जगत कहा जाता है ।
मुझे श्रीलाहिरी महाशय के साथ हुयी घटना याद आ गई जब बाबा महावतार ने उनके लिए जंगल में सोने का महल बना दिया था, जिसका अस्तित्व सिर्फ उन लोगों के लिए ही था ।
सदगुरुदेव ने कहा कि तुम जिस प्रश्न का जवाब ढूंढ रहे हो, उसका जवाब भी माया जगत ही है ।
मतलब कि भावना माया जगत से निर्मित थी ?
हां, इसी लिए उसका अस्तित्व सिर्फ तुम तक सीमित था ।
फिर वो सूक्ष्म जगत में कैसे आ सकती है?
माया जगत सूक्ष्म जगत से ऊपर स्थित अवस्था है, उसमें प्रवेश करने के लिए खुद को ऊष्मामय बनाना पड़ता है, यूं पृथ्वी, जल ,वायु तत्वों का लोप करके अग्नि और आकाश तत्व मात्र से उसमें प्रवेश पाया जाता है ।
इसी प्रकार, जिस प्रकार सूक्ष्म जगत से स्थूल जगत में प्रवेश किया जाता है, उसी प्रकार से माया जगत से सूक्ष्म या स्थूल में भी प्रवेश किया जाता है । माया जगत में निवास करती हुयी आत्माएं अपना अस्तित्व सिर्फ उनके सामने प्रकट करते हैं जिनके सामने वो करना चाहें और फिर अपना अस्तित्व समेट लेते हैं ।
अब मैं कुछ समझ पाया कि भावना माया जगत से थी, जिससे मेरी मुलाकात तब हुयी थी जब उसने सूक्ष्म जगत में प्रवेश किया था और संयोगवश मैंने भी प्रवेश किया था, उसने अपना अस्तित्व सिर्फ मेरे सामने प्रकट किया था, इस लिए उसका अस्तित्व सिर्फ मेरे लिए ही था । और, किसी के लिए उसका अस्तित्व था ही नहीं ।
ख़ुशी तो बहुत हुयी दिल के अन्दर कि आखिर रहस्य का अनावरण हो गया । तो….भावना का अस्तित्व जरुर माया जगत में अब भी होगा ही…
एक दिन गुरुदेव मूड में बैठे थे तब मैंने पूछा कि गुरुदेव कितने जगत होते हे तो उन्होंने कहा अनंत….
मैंने और कुछ सवाल नहीं किया और मुस्कुराकर योजना के अनुसार पूछा कि गुरुदेव एक और सवाल है, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा कि क्या है पूछो । मैंने कहा गुरुदेव माया जगत में कैसे प्रवेश किया जाता है और वहां के निवासियों से कैसे मिला जा सकता है….
बस इतना ही कहना था कि गुरुदेव के नेत्र जैसे अग्नि ज्वाला बन गये, चेहरा लाल सुर्ख हो गया और चिल्लाते हुए बोले " मूर्ख………. लगता है तू अभी भी उस मायाविनी के मोह से मुक्त नहीं हुआ है । तंत्र के रास्ते पर मोह ग्रस्त होना, खुद का पतन करना ही है । मोह को छोड़ और आगे बढ़ वरना…"
सही ही तो था, मैं मोह से बाहर ही नहीं आया था उसके, बस फिर क्या था, जीवन का वो एक नया अध्याय था जहां पर भावना का अध्याय ख़त्म हो गया ।
काफी समय बाद मैंने गुरुदेव से माफ़ी मांगी तो उन्होंने मुझे आगे बढ़ने का आशीर्वाद दिया
(क्रमशः)
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