स्वःलोक-सिद्धात्मा द्वारा संशय निवारण-3
- Rajeev Sharma
- Oct 20, 2019
- 4 min read
Updated: Sep 3, 2023
आवाहन भाग - 27
गतांक से आगे...
दिव्य देहधारी महासिद्ध ने मेरे प्रश्न के उत्तर में बताया, "साधक के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र वही होता है जिसमें उसकी रुचि हो। साधक खुद ही उस क्षेत्र की तरफ आकर्षित होने लगेगा जिस क्षेत्र की तरफ उसे बढ़ना चाहिए" । क्योंकि जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि साधक को चाहे अपने मूल के बारे में ज्ञान हो या ना हो, उसके अंतर्मन में सारी स्मृतियां होती ही हैं और, यही अंतर्मन साधक को रिक्तता के बारे में सूचित करता रहता है और, अंत में वह साधना मार्ग पर आगे बढ़ ही जाता है। इस लिए यह सवाल नहीं है कि साधक को किस क्षेत्र में सफलता मिलेगी।
सफलता हर एक साधक को हर एक क्षेत्र में मिल ही सकती है जब साधक की तरफ से उसके ज्ञान प्रदाता की तरफ पूर्ण रूप से समर्पण भाव हो।
इसके अलावा ज्ञान प्रदाता अर्थात गुरु भी उस ज्ञान पर अपना आधिपत्य रखता हो। अगर गुरु के पास ज्ञान है तो उसका कर्तव्य है कि वह उस ज्ञान को अपने समर्पित शिष्यों को दे ही। और शिष्यों का भी यह कर्तव्य है कि वह गुरु की शरण में पूर्ण रूप से समर्पित भाव से ही रहे ।
दिव्य देहधारी सिद्ध की बातें सुन कर कुछ कोंध सा गया मेरे दिमाग में, लगा जैसे कुछ याद आ रहा है लेकिन, मैंने अपने विचारों को सिद्ध की बातों पर ही केंद्रित करना उचित समझा। सारे विचारों को मन से हटा कर वापस से सिद्ध की बातों की तरफ गौर करने लगा।
सिद्ध ने अपनी बात को आगे बढ़ाया कि कई बार, सिद्धगुरु जन्म नक्षत्रों के योग से यह सुनिश्चित करते हैं कि साधक का पूर्व जीवन किस प्रकार की साधनाओं में व्यतीत हुआ है और उसे किस क्षेत्र की तरफ आगे जाना चाहिए क्योंकि, पूर्व स्मृति से अधिक से अधिक चेतना को प्राप्त किया जा सके। इसके अलावा सिद्धगुरु अपने शिष्य के पूर्व जीवन को देख कर भी यह निर्णय ले सकता है।
इससे भी आगे अगर एक सद्गुरु चाहे तो वह अपने शिष्य को किसी भी क्षेत्र में निपुण बना ही सकता है और एक से अधिक क्षेत्र में भी निपुणता दे सकता है। वस्तुतः साधक के लिए यह प्रश्न है ही नहीं, यह प्रश्न गुरु के ऊपर है कि साधक को किस क्षेत्र में कितनी सफलता वह दिला सके। इस लिए साधकों के हित में यही रहता है कि उसकी जिस भी साधना में रुचि हो, करता रहे, इसलिए नहीं कि वहां पर मार्गदर्शन नहीं है, वरन इसलिए, कि वह रास्ता उसके अंतर्मन के द्वारा निर्धारित है।
साधक को उचित समय पर निश्चित रूप से मार्गदर्शन की प्राप्ति हो ही जाती है लेकिन, एक निश्चित काल तक उसको अपना मार्जन करने के लिए इस प्रकार से साधना करते रहना चाहिए। मैंने कहा, क्या इसका अर्थ ये है कि साधक को गुरु के सामने अपने कार्यक्षेत्र का चुनाव करने की ज़रूरत नहीं है? सिद्ध ने कहा, "जब साधक ने अपने आप को गुरु के चरणों में समर्पित कर ही दिया है तब वहां पर चुनाव की बात ही कहां पर है?
साधक तो एक खाली बर्तन होता है और यह गुरु के ऊपर होता है कि वह उसमें क्या और कैसे भरे।
सिद्ध की बात सुन कर वापस से ऐसा लगा जैसे कुछ याद आ रहा है लेकिन समझ नहीं पाया। मैंने पूछा कि इसका अर्थ तो यह है कि साधक को साधना करते रहना है और, उचित समय पर गुरु का मार्गदर्शन उसे मिल ही जाता है लेकिन, अगर गुरु की प्राप्ति नहीं हुई तो?
महासिद्ध ने कहा कि साधक को साधना पथ पर जिस प्रकार से गतिशीलता में मदद मिलती है, उसी प्रकार से उसे तब तक किस तरह से और कैसे साधना करनी है उस निर्णय में उसकी सहायता स्वः लोक के सिद्ध भी करते है। इस लिए साधक के लिए चिंता का विषय है ही नहीं।
साधक को सिर्फ इतना करना है कि वह साधना करे और पूर्ण समर्पण भाव से युक्त हो कर करे और, करता रहे।
बाकी इसकी पूरी गतिशीलता का दायित्व ऊपर के कई सिद्धमंडल तथा स्वः लोक के सिद्धों का होता ही है। लेकिन जो इससे भी उच्चतम सिद्ध सद्गुरु होते हैं वह पहले से ही निर्धारण कर के रखते है कि उनके शिष्य किस प्रकार से क्या करेंगे, और, प्रकृति ऐसे सिद्धों के विचारों को अपने लिए आज्ञा मान कर उसका पालन करने के लिए तत्पर रहती है।
इस लिए हर समर्पित साधक का हर एक साधनात्मक पल इन्हीं महासिद्धों द्वारा पूर्व निर्धारित होता है।
मैंने कहा कि इससे गुरु की प्राप्ति कैसे संभव है और किस प्रकार से?
उन्होंने कहा कि इससे गुरु की प्राप्ति सिर्फ तभी हो सकती है जब व्यक्ति पूर्ण रूप से अपना समर्पण भाव सामने रखे और पूर्ण प्रेममय रहे। ऐसे महासिद्धों का दर्शन करना भी जीवन में उच्चतम साधनात्मक सौभाग्य ही है ।
तंत्र ग्रंथों में विवरण है कि अगर साधक स्वः लोक से संबंधित सिद्धों से दीक्षा प्राप्त करना चाहे तो उसे निम्न गुरु कृपा प्राप्ति मन्त्र का शत लक्ष (एक करोड़) जाप करना करना पड़ता है -
।। गुं गुरुभ्यो नमः ।।
मैं मन ही मन तुरंत ही ये सोच में पड़ गया कि सदगुरुदेव की करुणा कितनी है हम लोगों पर, कि वह हमें इतने प्रेम से दीक्षा दे कर हमारा सारा भार अपने कंधों पर ले लेते हैं, जबकि उसके लिए जो विधान है वह हम कभी जिंदगी भर भी ना कर पाएं, उम्र बीत जाती है सिर्फ इसी आस में कि एक दिन किसी सिद्ध की कृपा प्राप्त होगी। लेकिन, सदगुरुदेव ने प्रेमपूर्ण हमें जो दिया शायद उस अमूल्य का हमारी दृष्टि में कोई मोल ही नहीं है।
कितने प्रेममय हो कर वह हीरक खंड लुटा रहे थे और हम बस देखते ही रहे...
खुद के लिए ही एक क्षण को मन क्षोभ से भर आया ...
आज इस ज्ञान को प्राप्त कर मन ही मन प्रणाम कर लिया मैंने उस प्रकाशपुंज को, जिसने, मुझे वापस एक बार यह ज्ञान दिया था कि सदगुरुदेव हमें कितना प्रेम करते है।
हां, एक बात बताना चाहूंगा, ऐसे महासिद्ध जो स्वःलोक से भी कई गुना ऊपर हों, वह अपने मूल रूप में कभी कभी ही दर्शन देते है क्योंकि उनके तेज को सहन नहीं किया जा सकता और, उस समय जो शक्ति संचार होता है वह इतना अधिक होता है कि साधक तो अपना आपा ही खो बैठेगा। इसलिए ज्यादातर वह एक प्रकाशपुंज के रूप में ही दर्शन देते है। मुझे जो सिद्ध अभी ज्ञान प्रदान कर रहे थे वह भी ऐसे ही एक सिद्ध थे।
मैंने मन ही मन वापस एक बार उस हलकी सी स्वर्ण चमक लिए हुए शुभ्र प्रकाश पुंज को प्रणाम किया...
(क्रमशः)
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