यंत्र विशेषांकः प्राण प्रतिष्ठा, आत्मसामिप्यिकरण एवं प्राण सायुज्यीकरण क्रिया
- Rajeev Sharma
- Jan 21
- 6 min read
Updated: Mar 6
गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल
प्राण प्रतिष्ठा, आत्मसामिप्यिकरण एवं प्राण सायुज्यीकरण क्रिया

आपको जो यंत्र भेजे गये हैं वह प्राण प्रतिष्ठित हैं और पूर्ण रूप से जाग्रत हैं । आप चाहें तो सीधे ही उस पर साधना संपन्न कर सकते हैं । हालांकि आज इस लेख में आपको प्राण प्रतिष्ठा, आत्मसामिप्यिकरण एवं प्राण सायुज्यीकरण क्रिया भी बतायी जा रही है ताकि आप इस प्रक्रिया को खुद भी करके देख सकें, इसके प्रत्यक्ष प्रभाव को देख सकें और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी क्रियात्मक रूप में सुरक्षित कर सकें ।
वरिष्ठ गुरुभाईयों द्वारा प्रदत्त इस अनमोल ज्ञान के प्रति कृतज्ञता जाहिर करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता ।
पवित्रीकरणः अपने उलटे हाथ की हथेली में थोड़ा सा जल लेकर निम्न मंत्र बोलते हुए जल अपने चारों ओर छिड़कें
।। ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोSपि वा यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं सः वाह्याभ्यंतरः शुचि ।।
आचमनः आंतरिक तत्वों की शुद्धि के लिए यह प्रक्रिया अत्यंत ही आवश्यक है । सीधे हाथ में जल लेकर चार बार यह मंत्र पढ़ें और उस अभिमंत्रित जल को स्वयं पी लें ।
ॐ आत्मतत्वं शोधयामि नमः
ॐ विद्यातत्वं शोधयामि नमः
ॐ शिवतत्वं शोधयामि नमः
दिग्बंधनः दसों दिशाओं में से विघ्न आपकी साधना में बाधा न डालें, इसके लिए अपने हाथ में जल या अक्षत लेकर निम्न मंत्र पढ़ते हुये दसों दिशाओं में बिखेर दें –
ॐ अपसर्पंतु ये भूता ये भूताः भूमि संस्थिता ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यंतु शिवाज्ञा ।
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम सर्वेषाम विरोधेन पूजाकर्म समारंभे ।।
संकल्पः
सीधे हाथ में जल लेकर संकल्प करें कि हे गुरुदेव महाराज, मैं ... (अमुक नाम) मेरे पिता/पति का नाम ...(अमुक) है और.... अमुक स्थान का निवासी .... अमुक गोत्र उत्पन्न आपकी शरणागति में हूं । मैं आज इस यंत्र मंडल को स्वयं से संपर्कित और प्रतिष्ठित करने के लिए सदगुरुदेव आपके समक्ष यह प्रयोग संपन्न करने जा रहा या रही हूं। आप मुझे इस साधना को करने की आज्ञा प्रदान करें और मुझे वह साहस और शक्ति प्रदान करें जिससे मैं इस साधना को संपन्न कर सकूं । आप मुझे अपनी कृपा दृष्टि प्रदान करें जिससे मैं अपने अभीष्ट मनोरथ में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकूं ।
इतना कहकर जल को जमीन पर छोड़ दें ।
इसके बाद निम्न मंत्र से सभी देवताओं को नमस्कार करें -
।। श्रीमन् महागणाधिपतये नमः लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः उमा महेश्वराभ्यां नमः शची पुरंदराभ्यां नमः मातृ पितृ चरण कमलेभ्यो नमः इष्ट देवताभ्यो नमः कुल देवताभ्यो नमः ग्राम देवताभ्यो नमः स्थान देवताभ्यो नमः वास्तु देवताभ्यो नमः वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः शची पुरंदराभ्यां नमः सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः सर्वेभ्यो ऋषिभ्यो नमः ।।
गणपति पूजन
।। ॐ सुमखश्चैकदंतश्च कपिलो गज कर्णकः लंबोदरश्चविकटो विघ्ननाशो विनायकः
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजाननः द्वादशै तानि नामानि यः पठेच्छ्रणुयादपि
विद्यारंभे विवाहे च प्रवेश निर्गमे तथा संग्रामे संकटेचैव विघ्नस्तस्य न जायते ।।
निखिलेश्वरानंद कवच
आपकी साधना का पूर्ण फल आपको प्राप्त हो और आपकी साधना पूर्ण रूप से कवचित हो, इसके लिए आप निखिलेश्वरानंद कवच का एक पाठ अवश्य करें । कवच आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं ।
गुरु ध्यान
।। गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः
ध्यान मूलं गुरुर्मूर्ति पूजा मूलं गुरुः पदम मंत्र मूलं गुरुर्वाक्य मोक्ष मूलं गुरुः कृपा
मूकं करोति वाचालं पंगु लंघयते गिरिं यत्कृपा त्वमं वंदे परमानंद माधवम
गुरु कृपा ही केवलं गुरु कृपा ही केवलं गुरु कृपा ही केवलं गुरु कृपा ही केवलं
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः ध्यानं समर्पयामि ।
इसके बाद पंचोपचार से गुरुपूजन करें । पंचोपचार मतलब गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग पदार्थ अर्पण) । गुरु पूजन की संक्षिप्त विधि आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं ।
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः आवाहनं समर्पयामि । (सदगुरुदेव का आह्वान करें)
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः आसनं समर्पयामि । (आसन के लिए एक फूल अर्पित करें)
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः पाद्यं समर्पयामि । (श्री चरणों में जल अर्पित करें)
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः अर्घ्यं समर्पयामि । (हाथों में जल अर्पित करें)
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः कुंकुमं तिलकं च समर्पयामि । (तिलक और अक्षत चढ़ायें)
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः धूपं दीपं च दर्शयामि । (धूप और दीप प्रज्वलित करें)
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः नैवेद्यं निवेदयामि । (नैवेद्य प्रसाद अर्पित करें)
श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः नमस्कारं करोमि । (श्री गुरुदेव को पूजन उपरांत प्रणाम करें)
गुरु पूजन करने के बाद गुरु मंत्र की कम से कम 4 माला अवश्य जप करनी चाहिए ।
पूजनः मंडल में अंकित गुरु सायुज्य महायंत्र का चंदन (किसी भी रंग) आदि से पूजन करें । इसके बाद कम से कम 1 माला गुरु मंत्र जप अवश्य करें ।
स्नानः इसके बाद पंचगव्य को ह्रौं मंत्र के 108 बार जप से अभिमंत्रित कर लें तथा इस शोधित पंचगव्य का लेप मंडल पर कर लें । पंचगव्य को आप गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर के द्वारा बना सकते है ।
।। ह्रौं।।
Hraum
इसके बाद मंडल को पात्र में स्थापित कर पंचामृत से स्नान करवायें तथा शुद्ध जल से स्नान करवाकर स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर सामने पात्र में स्थापित कर लें । स्नान कराने के लिए चांदी या तांबे का पात्र प्रयोग करें ।
यंत्र गायत्री मंत्रः इसके बाद यंत्र गायत्री मंत्र का 108 बार उच्चारण करें ।
।। ॐ यंत्रराजाय विद्महे महायंत्राय धीमहि तन्नो यंत्रः प्रचोदयात ।।
Om Yantra Rajaay Vidmahe Maha Yantraay Dhimahi Tanno Yantrah Prachodayat
गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल यंत्र की प्राण प्रतिष्ठाः निम्न मंत्र का 108 बार उच्चारण करें -
ॐ आं ह्रीं क्रों असि आ उ सा य र ल व् श ष हंस गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल यंत्र त्वाग्र शास्त्र मांस मेदोSस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल यंत्रस्य काय वाङमनश्चक्षु गोत्र घ्राण मुख जिव्हा सर्वाणि इन्द्रियाणि शब्द स्पर्श गंध प्राणापान समानोदान व्यानाः सर्वे प्राणाः ज्ञान दर्शन प्राणश्चइहेव आशु आगच्छत आगच्छत संवोषट स्वाहा । अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्वाहा । अत्र मम सन्निहिता भवत भवत वषट वषट स्वाहा । अत्र सर्वजन सौख्याय चिरकालं नन्दतु वद्वातां वज्र मय भवन्तु । अहं वज्रमयान करोमि स्वाहा ।
आत्मसामिप्यकरण और प्राण सायुज्यीकरण
इसके बाद यंत्र में आत्मसामिप्यकरण और प्राण सायुज्यीकरण की क्रिया की जाती है ।
इसके लिए अपने बाएं हाथ की अनामिका उंगली द्वारा स्वयं की नाभि को स्पर्श करना है और दाहिने हाथ से अक्षत यंत्र पर डालना है ।
एक मंत्र बोल कर एक बार अक्षत अर्पित करना है ।
इस प्रकार क्रम से निम्न 10 प्राण मंत्रों का उच्चारण करते हुए क्रिया करनी है ।
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं प्राणशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं अपानशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं समानशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं व्यानशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं उदानशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं नागशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं कूर्मशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं कृकरशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं देवदत्तशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
अं कं चं टं तं पं यं सं क्षं ह्रौं ऐं ह्रीं क्लीं धनञ्जयशक्ति स्थापयामि/पूजयामि
इसके बाद निम्न मंत्रों का उच्चारण 3 – 3 बार करते हुये पुष्प और अक्षत अर्पित करें । अर्थात एक मंत्र को 3 बार बोलना है और तीन बार ही अक्षत अर्पित करना है –
ॐ त्वरिता देव्यै स्थापयामि
ॐ सिद्धि दात्री देव्यै स्थापयामि
ॐ रति देव्यै स्थापयामि
ॐ सरस्वती देव्यै स्थापयामि
ॐ लक्ष्मी देव्यै स्थापयामि
ॐ ज्येष्ठा देव्यै स्थापयामि
ॐ मातंगी देव्यै स्थापयामि
ॐ कुलयामिनी देव्यै स्थापयामि
ॐ दुर्गा देव्यै स्थापयामि
ॐ क्षमा देव्यै स्थापयामि
ॐ शिवा देव्यै स्थापयामि
ॐ भद्रकाली देव्यै स्थापयामि
ॐ दक्षिण काली देव्यै स्थापयामि
ॐ वाम काली देव्यै स्थापयामि
ॐ श्मशान काली देव्यै स्थापयामि
ॐ काल काली देव्यै स्थापयामि
ॐ कामकला काली देव्यै स्थापयामि
ॐ नृत्य काली देव्यै स्थापयामि
ॐ मंगला काली देव्यै स्थापयामि
ॐ कपाल काली देव्यै स्थापयामि
ॐ मुण्ड काली देव्यै स्थापयामि
ॐ कृष्ण काली देव्यै स्थापयामि
ॐ श्यामा काली देव्यै स्थापयामि
ॐ विपरीत रति काली देव्यै स्थापयामि
मंत्र पुष्पांजलि
हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर यंत्र पर डालें -
“नाना सुगंध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानी च पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर”
क्षमा प्रार्थनाः पूजन और मंत्र जप के उपरांत क्षमा प्रार्थना अवश्य करें -
आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे
यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्रा हीनं च यद भवेद तत्सर्वं क्षम्यतां देव क्षमस्व परमेश्वर ।
जप समर्पणः हाथ में फूल लेकर सदगुरुदेव के चरणों और यंत्र पर अर्पित करें
"गुह्यातिगुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत कृतं जपत सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादानमहेश्वरः"
प्रार्थनाः
।। ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाव शिष्यते ।।
यंत्र उत्थापनः
मंडल के पूजन के बाद उत्थापन क्रम संपन्न करना चाहिए । इस क्रिया से यंत्र का पूर्ण रूप से उत्थापन हो जाता है और वो साधक के साथ आत्मेकाकार होकर साधक का प्रतिनिधित्व करने लगता है । जब आप उस यंत्र के सामने मंत्र जप करते हैं तो वो मंत्र उस यंत्र के अधिपति देव के सामने आपके प्रतिनिधित्व की क्रिया करते हुए आपकी आत्मशक्ति और भाव शक्ति का योग भी उस अधिपति से करवाता है ।
इससे आपका जप सामान्य जप नहीं रह जाता है और एक चैतन्य क्रिया में बदल जाता है ।
सतत जप से प्रारब्ध कर्मों का मलावरण अतिशीघ्रता से क्षीण होने लगता है और मंत्र ध्वनि में दिव्यता का संचार होने लगता है तथा अभीष्ट प्राप्ति की संभावना बढ़ जाती है ।
सबसे पहले कुमकुम से रंगे हुए अक्षत से त्रयी तत्वान्तर्गत 36 शक्तियों का स्थापन यंत्र में करें । इसके लिए एक मंत्र बोलकर यंत्र के मध्य में अक्षत अर्पित करें । इसके लिए 2 – 4 दाने डालना पर्याप्त है ।
ॐ शिव शक्तयै नमः
ॐ आद्य शक्तयै नमः
ॐ सदाशिव शक्तयै नमः
ॐ ईश्वर शक्तयै नमः
ॐ शुद्धविद्या शक्तयै नमः
ॐ माया शक्तयै नमः
ॐ कला शक्तयै नमः
ॐ विद्या शक्तयै नमः
ॐ राग शक्तयै नमः
ॐ काल शक्तयै नमः
ॐ नित्याति शक्तयै नमः
ॐ पुरुष शक्तयै नमः
ॐ प्रकृति शक्तयै नमः
ॐ बुद्धि शक्तयै नमः
ॐ अहंकार शक्तयै नमः
ॐ मनः शक्तयै नमः
ॐ घ्राण शक्तयै नमः
ॐ जिव्हा शक्तयै नमः
ॐ श्रोत्र शक्तयै नमः
ॐ त्वक शक्तयै नमः
ॐ श्रवण शक्तयै नमः
ॐ वाक् शक्तयै नमः
ॐ पाणि शक्तयै नमः
ॐ पाद शक्तयै नमः
ॐ वायु शक्तयै नमः
ॐ उपस्थ शक्तयै नमः
ॐ शब्द शक्तयै नमः
ॐ स्पर्श शक्तयै नमः
ॐ रूप शक्तयै नमः
ॐ रस शक्तयै नमः
ॐ गंध शक्तयै नमः
ॐ आकाश शक्तयै नमः
ॐ वायु शक्तयै नमः
ॐ जल शक्तयै नमः
ॐ अग्नि शक्तयै नमः
ॐ पृथ्वी शक्तयै नमः
64 योगिनी स्थापन (चतुषष्ठि योगिनी स्थापन)
कुमकुम से रंगे हुए अक्षत यंत्र पर डालते हुए निम्न मंत्र का 8 बार उच्चारण करें -
।। ॐ आवाहयाम्बहं देवी योगिनी परमेश्वरीम् । योगाभ्यासेन संतुष्ट पराध्यान समन्विताः ।।
चतुषष्ठी योगिनीभ्यो नमः
अब आप अपनी वांछित साधना के मूल यंत्र अथवा मंडल पर 108 अक्षत के दाने (कुंकुम से रंगे) निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए 1 – 1 दाना अर्पित करते जाएं । ये क्रिया भी पहले दिन ही की जाती है –
ॐ असुनीते पुनरस्यामु चक्षुः पुनः प्राणमित नोधेहि भोगम् ।
ज्योक्पश्येम सूर्य मुच्चरुतमनुमते मृडयानः स्वस्ति ।।
यंत्र दीपनः
यंत्र उत्थापन के बाद उस यंत्र का दीपन किया जाता है जिससे यंत्र मात्र जाग्रत ना होकर पूर्ण दीप्त हो जाता है तथा, आपको पूर्ण सफलता देने में समर्थ हो जाता है । इसके लिए ताम्र पात्र में रखे हुए जल के सामने तारिणी दीप्ति मंत्र की एक माला संपन्न कर लेनी चाहिए-
।। ऐं ह्रीं श्रीं ह्रों ॐ ह्रीं श्रीं हुं फट् हसों हूं ।।
Aim Hreem Shreem Hrom Om Hreem Shreem Hum Phat Hasom Hoom
रात्रि में जब आप मूल साधना प्रारंभ कर रहे हों तब इसी तारिणी दीप्ति बीज मंत्र का 10 बार उच्चारण करते हुए कुश या पुष्प के द्वारा मूल यंत्र पर छीटा दें । इस क्रिया के पूर्ण होते ही यंत्र की ऊर्जा और उसके वर्ण में चमक की तीव्रता को अनुभव कर सकते हैं ।
फिर, जल को अपने पर छिड़कते हुए उठ जाएं ।
।। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।।
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Jai gurudev 🙏 🙏 🙏
nice