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यंत्र विशेषांकः भैरव स्थापन विशेषांक

Updated: Mar 4

गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल


पिछले लेख में हमने कुछ दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण क्रियाओं को संपन्न करना सीखा था । आज हम गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल पर उत्थापन न्यास, भैरव स्थापन एवं भैरव उत्थापन की क्रिया के बारे में सीखेंगे ।


उत्थापन न्यास


किसी भी साधना में उत्थापन न्यास एक महत्वपूर्ण क्रिया होती है जिसके द्वारा शक्ति को शरीर के विभिन्न अंगों में समाहित किया जाता है । इस क्रिया में मातृका और उसकी कलाओं के साथ शक्ति का योग कर उस शक्ति का स्वयं के साथ एकात्म स्थापित किया जाता है । वरिष्ठ गुरुभाईयों ने स्पष्ट कहा था कि इस क्रिया के संपन्न करने के बाद साधक, साध्य और सिद्धि में कोई भेद नहीं रह जाता है


ध्यान के बाद न्यास की क्रिया जहां सपन्न की जाती है, उसी समय गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल को सामने स्थापित करते हुये ये क्रिया की जाती है; इसमें ये क्रम 2 बार करना होता है -


  1. पहली बार में आप पूर्ण मंत्र के साथ स्थापयामि पूजयामि का प्रयोग कर मंडल पर कुंकुम मिश्रित अक्षत अर्पित करेंगे । इस क्रिया को अंगकला स्थापन व पूजन क्रिया कहते हैं । इसके माध्यम से शक्ति के सभी अंगों का यंत्र में स्थापन एवं पूजन होता है ।

  2. दूसरी बार में पूर्ण मंत्र के साथ मात्र स्थापयामि शब्द का प्रयोग करेंगे (पूजयामि शब्द का नहीं) और जिस मंत्र के सामने शरीर के जिस अंग का नाम लिखा है, उसे स्पर्श करेंगे । इस क्रिया को उत्थापन न्यास क्रिया कहते हैं जिसके माध्यम से उन अंगों का स्वयं के शरीर में पूजन होता है। इस क्रिया के माध्यम से साधक स्वयं और मंत्र देवता के मध्य का भेद समाप्त कर स्वयं को उस शक्ति के रूप में परिवर्तित कर लेता है ।


अंगकला पूजन मंत्र -


अं निवृत्ति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - शिरसि

आं प्रतिष्ठा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - मुखे

इं विद्या कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण नेत्रे

ईं शांति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम नेत्रे

उं इन्धिका कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण कर्ण

ऊँ दीपिका कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम कर्ण

ऋं रेचिका कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्ष नासे

ऋृं मोचिका कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम नासे

लृं परा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण कपोले

लृृं सूक्ष्मा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम कपोले

एं सूक्ष्मामृता कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - अधरे

ऐं ज्ञानामृता कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - ओष्ठे

ओं आप्यायिनी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - अधोदंते

औं व्यापिनी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - उर्ध्व दंते

अं व्योमरूपा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - जिव्हे

अः अनंता कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - ग्रीवाये

कं सृष्टि कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण बाहुमूले (काँख)

खं ऋद्धि कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण कूर्परे (कोहनी)

गं स्मृति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण मणिबंधे

घं मेधा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि -दक्षिण अन्गुलमूले

ङ कांति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण अन्गुल्यग्र

चं लक्ष्मी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम बाहुमूले (काँख)

छं धृति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम कूर्परे (कोहनी)

जं स्थिरा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम मणिबंधे

झं स्थिति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम अन्गुलमूले

ञं सिद्धि कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम अन्गुल्यग्र

टं जरा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण ऊरुमूल (जंघा का मूल)

ठं पालिनी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण जानु (जंघा)

डं शांति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण गुल्फ (घुटना)

ढं ऐश्वरी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण पादांगुलिमूल

णं रति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण पादांगुलिग्र

तं कामिका कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम ऊरुमूल (जंघा का मूल)

थं वरदा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम जानु (जंघा)

दं आह्लादिनी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम गुल्फ (घुटना)

धं प्रीति कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम पादांगुलिमूल

नं दीर्घा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम पादांगुलिग्र

पं तीष्णा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण कुक्षि (पेट)

फं रौद्री कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम कुक्षि (पेट)

बं भया कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - पृष्ठ

भं निद्रा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - नाभि

मं तन्द्रा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - उदर

यं क्षुत्कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - हृदय

रं क्रोधिनी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - दक्षिण स्कंध (कंधा)

लं क्रिया कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - वाम स्कंध

वं उत्कारी कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - तालु (मुंह की छत)

शं मृत्यु कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि -हृदय तु दक्षिण हस्ते

षं पीता कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि -हृदय तु वाम हस्ते

सं श्वेता कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - हृदय तु दक्षिण पादे

हं अरुणा कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - हृदय तु वाम पादे

क्षं अनंता कला रूपेण परालोक शक्तयै नमः स्थापयामि/पूजयामि - ब्रह्मरन्ध्रे


भैरव स्थापन


भैरव स्थापन के बिना तंत्र की क्रियाओं में सफलता प्राप्त हो ही नहीं सकती है, अतः समस्त उच्चकोटि के साधक अपनी साधना के प्रारंभ में ही भैरव स्थापन और भैरव उत्थापन जैसी क्रिया को संपन्न कर लेते हैं । इस क्रिया के करने से उनको एक पूर्ण सुरक्षा चक्र की प्राप्ति होती है और तीक्ष्ण शक्तियों के मध्य वो सुरक्षित रहता हुआ पूर्ण सफलता प्राप्त कर लेता है । भैरव स्थापन के इस विशेषांक में विस्तार से इन प्रक्रियाओं पर चर्चा की गयी है ।

भगवान भैरव
भगवान भैरव

जब भी कोई तंत्र साधना कर रहे हों तो तंत्र मंडल पर यही क्रिया करने के बाद मूल साधना की जानी चाहिए ।


आवाहन मुद्रा एवं संस्थापिनी मुद्रा
आवाहन मुद्रा एवं संस्थापिनी मुद्रा

गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल के ऊपर की ओर कुंकुम की बिंदी लगाते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण संस्थापिनी मुद्रा का प्रदर्शन करते हुये करें (आवाहन मुद्रा को पलट दिया जाए तो यहीं संस्थापिनी मुद्रा बन जाती है और संस्थापिनी मुद्रा में हथेलियां जमीन की तरफ और पृष्ठ भाग आसमान की तरफ होता है) -

ॐ करालाय नमः - पूर्वे


उसके बाद मंडल के दाहिने हिस्से में कुंकुम का तिलक लगाते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण संस्थापिनी मुद्रा का प्रदर्शन करते हुये करें -

ॐ विकरालाय नमः - दक्षिणे


फिर, मंडल के निचले हिस्से में कुंकुम का तिलक लगाते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण संस्थापिनी मुद्रा का प्रदर्शन करते हुये करें -

ॐ अतिकरालाय नमः - पश्चिमे


फिर, मंडल के बायें हिस्से में कुंकुम का तिलक लगाते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण संस्थापिनी मुद्रा का प्रदर्शन करते हुये करें -

ॐ महाकरालाय नमः - उत्तरे


तत्पश्चात दाहिने हाथ से लिंग मुद्रा का प्रदर्शन करते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें और सिंदूर मिश्रित अक्षत का एक दाना अर्पित करें, फिर दुबारा लिंग मुद्रा का प्रदर्शन करते हुये दूसरे मंत्र का उच्चारण करें और सिंदूर मिश्रित अक्षत का एक दाना अर्पित करें । इस प्रकार आखिरी मंत्र तक इसी क्रम को दोहराते जायें -

लिंग मुद्रा
लिंग मुद्रा

ॐ क्रोध भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ शमशान भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ कापाली भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ काल भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ कालान्तक भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ रुरु भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ महाघोर भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ घोरतर भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ संहार भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ चंड भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ हुंकार भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ अनादि भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ आनंद भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ भूताधिप भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ कृतान्त भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ असितांग नमः स्थापयामि

ॐ कालाग्नि भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ उग्रायुध भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ वज्रांग भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ कराल भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ विकराल भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ महाकाल भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ कल्पांत भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ विश्वान्तक भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ प्रचण्ड भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ भगमाली भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ उग्र भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ भूतनाथ भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ भद्र भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ संपतप्रद भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ मृत्यु भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ यम भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ अन्तक भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ उल्कामुख भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ एकपाद भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ प्रेत भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ मुंडमाली भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ बटुक भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ क्षेत्रपाल भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ दिगंबर भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ वज्रमुष्टि भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ घोरनाद भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ चंडोग्र भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ सन्तापन भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ क्षोभण भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ ज्वालासंवर्त्त भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ वीरभद्र भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ त्रिकालाग्नी भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ शोषण भैरवाय नमः स्थापयामि

ॐ त्रिुपरान्तक भैरवाय नमः स्थापयामि


भैरव उत्थापन


भैरव स्थापन के बाद त्रिशूल, खटवांग और कपाली मुद्रा का 2 - 2 मिनट प्रदर्शन करते हुये निम्न मंत्र का उच्चारण करें और सम्मुखिकरण मुद्रा का प्रदर्शन करते हुये 5 मिनट तक मंत्र का जप करें । इस क्रिया से स्थापित भैरव शक्ति पूर्ण रूप से जाग्रत और चैतन्य हो जाती है, तथा आपकी साधना में स्वयं के वरदान से पूर्ण अनुकूलता देती है ।


।। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं महाकाल कराल वदन ग्रहण ग्रहण भिन्धि भिन्धि त्रिशूलेन हन हन ठः ठः ।।

Om Hraam Hreem Hroom Mahakaal Kraal Vadan Grahan Grahan Bhindhi Bhindhi Trishoolen Han Han Thah Thah

 

अगले लेख में गुरु सायुज्य तंत्र सिद्धि माला का निर्माण कैसे किया जाता है, इसका क्या विधान है, इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे । तब तक आप इन विधानों को संपन्न कर लें ।


अस्तु ।

 

त्रिशूल मुद्रा
त्रिशूल मुद्रा




त्रिशूल मुद्रा


कनिष्ठिका उंगली को अंगूठे से दबाकर बाकी तीनों उंगलियों को सीधा कर देने से त्रिशूल मुद्रा बनती है ।







खटवाङ्ग मुद्रा
खटवाङ्ग मुद्रा



खटवाङ्ग मुद्रा


दायें हाथ की पांचों उंगलियों को मिलाकर ऊपर की ओर उठायें । यह शिवजी को अत्यंत प्रिय खटवाङ्ग मुद्रा कहलाती है ।







कपाली मुद्रा
कपाली मुद्रा


कपाली मुद्रा


बायें हाथ को पात्र जैसा बनाकर, उसमें अपनी बांयी ओर से कुछ उठाकर रखा जाता है - ऐसा प्रदर्शित करने को कपाल मुद्रा या कपाली मुद्रा कहा जाता है ।




सम्मुखीकरण मुद्रा
सम्मुखीकरण मुद्रा


सम्मुखीकरण मुद्रा


दोनों हाथों की मुट्ठियां बांध लें, अंगूठे अंदर कर लें और दिशा ऊपर की ओर रखने पर सम्मुखीकरण मुद्रा बनती है ।






 

ये मुद्रायें बहुत ही महत्वपूर्ण होती है । ऐसा इसलिए है कि हम देव शक्तियों का आवाहन तो करते हैं लेकिन हमें ये पता ही नहीं चल पाता है कि देव शक्तियां वहां तुरंत उपस्थित हो गयी हैं । ऐसी स्थिति में अगर आवाहन करने के बाद उनको निर्धारित मुद्रायें न दिखायी जाएं तो वह रुष्ट हो सकती हैं । इन मुद्राओं से आप उनको बैठने के लिए, भोजन करने के लिए, भोग ग्रहण करने के लिए या जो भी आपका अभीष्ट है, उनका संकेत देव शक्तियों को किया जाता है । इससे देव शक्तियां प्रसन्न होती हैं और अपना आसन या भोजन पाकर आपको आशीर्वाद प्रदान करती हैं ।


मैं एक पुस्तक भी यहां अपलोड कर रहा हूं, इसे आप अन्य मुद्राओं को करने के लिए भी प्रयोग कर सकते हैं ।


अस्तु ।




 

2 Comments

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Guest
5 days ago

Excellent written. thx

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Guest
Feb 27
Rated 5 out of 5 stars.

अति सुंदर लेख

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