top of page

यंत्र विशेषांकः षट्कर्म साधनाओं में सफलता के सूत्र

गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल


पिछले लेख में हमने कुछ दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण क्रियाओं को संपन्न करना सीखा था । जिसमें प्रमुख रूप से

गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा, आत्मसामिप्यकरण और प्राण सायुज्यीकरण, यंत्र का उत्थापन किस प्रकार किया जाए और 64 योगिनी स्थापन थीं । इसके साथ ही यंत्र का दीपन किस प्रकार किया जा सकता है, उस पर भी चर्चा हुयी थी ।


षट्कर्म साधनाओं में सफलता के सूत्र


कुछ ऐसी दुर्लभ प्रक्रियायें हैं जिनका सीधा संबंध आपकी षट्कर्म साधनाओं से नहीं होता है लेकिन अगर उनका प्रयोग किया जाए तो षट्कर्म साधनाओं में सफलता प्राप्ति की संभावना प्रबल हो जाती है । इन दुर्लभ प्रक्रियाओं में मुख्य हैं आसन संस्कार, देह उत्थापन प्रायश्चित प्रयोग, अशुद्ध उच्चारण संस्कार, मूलाधार इष्ट स्थापन, मणिपुर इष्ट स्थापन, नाभि संस्कार मंत्र और शिवशक्ति स्थापन । इनके अलावा तीन और प्रक्रियायें ऐसी हैं जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं - यंत्र मंडल का उत्थापन न्यास, भैरव स्थापन और भैरव उत्थापन क्रिया ।

प्रयास कीजिए कि जब हम किसी विशेष साधना में बैठें तब इन प्रक्रियाओं को कम से कम एक बार तो संपन्न कर ही लिया जाए ताकि सफलता प्राप्ति में आ रही रुकावटों का सामना पूरी क्षमता के साथ किया जा सके ।


आसन संस्कार


भूमि को भली – भांति शुद्ध कर भूमि पर कुमकुम द्वारा मैथुन चक्र का निर्माण करने के बाद उस पर आसन बिछा दें ।

मैथुन चक्र
मैथुन चक्र

मैथुन चक्र के मध्य में बिंदु का अंकन नहीं करना है ।


आसन के ऊपर निम्न मंत्र का 21 बार उच्चारण करते हुये जल के छींटे दें ।


।। ॐ हुं पराशक्तयै हुं फट् ।।


उसके बाद आसन पर बैठकर दैनिक साधना विधि के अनुसार आसन पूजन कर लें ।


देह उत्थापन प्रायश्चित प्रयोग


इस प्रयोग के लिए साधना समाग्रियों के साथ बाजोट (चौकी) पर सामने की ओर एक लोहे का पात्र स्थापित कर लें ।

ये क्रिया साधना के प्रारंभ में रोज की जाती है ।


काले और सफेद तिलों को मिलाकर एक पात्र में रख लीजिए ।


आचमन और शुद्धिकरण के बाद सिद्धासन या वज्रासन में बैठकर एक चुटकी तिलों को दाहिने हाथ से उठाकर स्वयं के हृदय से स्पर्श करते हुये निम्न मंत्र का एक बार उच्चारण करें और उन तिलों को लोहे के पात्र में डाल दें ।

इस प्रकार ये क्रिया 108 बार करें । ये क्रिया साधना काल के प्रथम दिन से लेकर अंतिम दिन तक नित्य साधना से पूर्व करनी चाहिए ।

।। क्लीं दोष निवृत्त्ये फट् ।।

Kleem Dosh Nivrittye Phat


अशुद्ध उच्चारण संस्कार


अगर आप तीव्र साधना करने जा रहे हैं तो मंत्र जप से पहले निम्न मंत्र का जप अपने विशुद्ध चक्र पर ध्यान लगाकर और उसका स्पर्श करके 10 बार कर लें -


।। ह्रीं ।।

Hreem


मंत्र जप से पूर्व “ई” का 10 बार उच्चारण भी कर लेना चाहिए ।

षटकर्म साधना के लिए उच्चारण संस्कार


किसी पात्र में रक्तचंदन (लाल चंदन) रखकर उस पात्र के सामने 5 माला त्रिशक्ति मंत्र की संपन्न कर लें । ये क्रिया किसी भी अमावस्या या कृष्ण पक्ष की मध्य रात्रि में संपन्न की जा सकती है ।


।। ऐं ह्रीं क्लीं ।।


उसके बाद किसी भी रविवार को सूर्योदय से पूर्व पुनः एक माला इसी मंत्र की संपन्न कर अनार की शलाका (कलम) से सरस्वती बीज अपनी जिव्हा पर अंकित कर लें ।


।। ऐं ।।


चित्त पर पूर्ण नियंत्रण होता है, वाक शक्ति का आकर्षण बढ़ता है जिससे साधना स्वतः ही सफल और सत्य हो जाती है ।


मूलाधार इष्ट स्थापन


साधक आसन पर बैठने के बाद संबंधित शक्ति को तीन प्रमुख नाड़ियों के माध्यम से कुंडलिनी में स्थापित करता है । इसके लिए भगवान गणपति का ध्यान करते हुये निम्न मंत्र के द्वारा 24 बार प्राणायाम क्रिया की जाती है ।


।। ॐ लं गं लं ॐ ।।


इस क्रिया को संपन्न करने से वाह्य ब्रह्मांड के माध्यम से उस शक्ति का साधक की आंतरिक कुंडली से योग होता है और वो उन तीन नाड़ियों में स्थापित होकर शरीर को दिव्यता प्रदान करती है ।


मणिपुर इष्ट स्थापन


मूलाधार स्थापन के पश्चात मणिपुर इष्ट स्थापन की क्रिया की जाती है जिससे इष्ट का प्रसारण प्राणाग्नि और प्राणवायु के माध्यम से संपूर्ण शरीर के अणुओं से हो सके । इससे कार्मिक मलों का दहन होता है । मंत्र की ऊर्जा न सिर्फ प्राणों को दीप्त करती है बल्कि साधक भी दीप्त होता ही है । साधक का ध्यान और एकाग्रता बढ़ जाती है ।

जप करने में आनंद की अनुभूति होने लगती है । थकान और समय का उस पर साधना काल में कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।


इसके लिए नाभि संस्कार मंत्र का प्रयोग करना चाहिए -


।। ॐ रं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं रं ॐ ।।

Om Ram Dam Dam Nam Tam Tham Dham Nam Pam Pham Ram Om


नाभि संस्कार मंत्र का 24 बार उच्चारण किया जाता है । दाहिने हाथ से तंत्र कर्म सिद्धि मंडल को स्पर्श करते हुये बांए हाथ से सिद्धिप्रद रुद्राक्ष जो अघोर मंत्रों से अभिमंत्रित और प्रतिष्ठित हो, को स्वयं की नाभि से स्पर्श कराया जाता है ।


मणिपुर इष्ट स्थापन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि साधक के प्राणों एवं मंत्र ऊर्जा का योग मंडल और रुद्राक्ष से हो जाता है । ये सामग्रियां सहयोगी साबित होकर साधना काल में साधक की कुंडलिनी को मणिपुर चक्र से पतित नहीं होने देतीं । इसकी वजह से ब्रह्मचर्य भंग और स्वप्नदोष आदि होने की स्थिति न के बराबर हो जाती है । इससे साधना निष्कंटक संपन्न हो जाती है । इस मंत्र से नाभि को स्पर्श करने से प्राण अग्नि प्रदीप्त होती है और साधक पवित्र होकर साधना के योग्य होता है ।


कालांतर में इसी क्रिया को पाप पुरुष दहन और स्वमंत्र दीपन क्रिया भी कहा गया है ।


शिवशक्ति स्थापन


हालांकि इस विद्या पर विस्तार से एक लेख पहले ही वेबसाइट पर प्रकाशित किया जा चुका है लेकिन लेख का तारतम्य बनाये रखने के लिए इस मंत्र को इस क्रम में यहां भी उपलब्ध कराया जा रहा है । अगर आप उस लेख को पढ़ना चाहें तो शक्ति प्रवाह, साधना और सिद्धि - 3 में उसको पढ़ सकते हैं ।


षट्कर्म (यहां पर इसका तात्पर्य शांति कर्म से है) में सफलता चाहते हैं तो सदाशिव महामृत्युंजय की उपासना व अभिषेक किया जाता है । ये क्रिया साधना के पहले और अंतिम दिन प्रातःकाल सम्पन्न किया जाना ही चाहिए । इन सदाशिव महामृत्युंजय का निवास शिव चक्र में होता है और ये स्थान परा और अपरा शक्ति का होता है। इनका अभिषेक करने से संबंधित लोक की शक्तियों का आवाहन वाह्य ब्रह्मांड से अन्तः ब्रह्मांड की ओर करना सरल हो जाता है । देखा जाए तो यह क्रिया आपके और उस शक्ति के मध्य एक सूत्र की तरह कार्य करती है ।


इसके लिए पारद शिवलिंग या गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल को अभिषेक पात्र में स्थापित करके उसके ऊपर निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए पूर्ण विनम्र भाव से जल अर्पित करें -


ॐ नमो भगवते रुद्राय ।

अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्रकवचैरस्त्रैः राजचोरसर्पसिंहव्याघ्राग्न्याद्युपद्रवं नाशय नाशय ।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं ब्लूं फ्रों आं ह्रीं क्रों हुं फट् स्वाहा ।

त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टि वर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान मृत्युर्मक्षीय मामृतात् ।

अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्त यज्ञस्य सुक्रतुम् । वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्म द्विषो जहि ।

ॐ नमो भगवते रुद्राय । ॐ छां छायायै स्वाहा । ॐ चं चतुरायै स्वाहा । ॐ कुं कुलि स्वाहा । ॐ खुं खुलि स्वाहा । ॐ हिं हिलि स्वाहा । ॐ जं जलि स्वाहा । ॐ झं झलि स्वाहा । ॐ ऐं पिलि स्वाहा । ॐ ऐं पिलि पिलि स्वाहा । ॐ हरं स्वाहा । ॐ हरहरं स्वाहा । ॐ गं गंधर्वाय स्वाहा । ॐ रं रक्षसे स्वाहा । ॐ रं रक्षोSधिपतये स्वाहा । ॐ भूः स्वाहा । ॐ भुवः स्वाहा । ॐ स्वः स्वाहा । ॐ उल्कामुखि स्वाहा । ॐ रुं रुद्रजटि स्वाहा ।

ॐ अं ऊं मं ब्रह्मविष्णुरुद्रतेजसे स्वाहा । ॐ नमो भगवते रुद्राय । अचलमचलमाक्रम्याक्रम्य महावज्रकवचैरस्त्रैः राजचोरसर्पसिंहव्याघ्राग्न्याद्युपद्रवं नाशय नाशय ।

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं श्रीं क्लीं ब्लूं फ्रों आं ह्रीं क्रों हुं फट् स्वाहा । त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टि वर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान मृत्युर्मक्षीय मामृतात् । अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्त यज्ञस्य सुक्रतुम् । वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः । रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्म द्विषो जहि । ॐ नमो भगवते रुद्राय ।


ये पूरा एक ही मंत्र है । इसलिए आचमनी में जल लेकर पहले इस पूरे मंत्र का एक बार उच्चारण करें और उसके बाद ही यंत्र या शिवलिंग पर जल अर्पित करें ।


अस्तु ।


अगले लेख में गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल यंत्र का उत्थापन न्यास, भैरव स्थापन और भैरव उत्थापन क्रिया के बारे में बताया जाएगा ।


 



Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page