यंत्र विशेषांकः तंत्र कर्म सिद्धि मंडल पूजन विधान
- Rajeev Sharma
- 7 days ago
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गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल पूजन विधान
अब तक हमने गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल महायंत्र पर कई प्रक्रियाओं को संपन्न करना सीखा है । ये बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रियायें हैं और बिना इनके महाशांति विधान की साधना में सफलता प्राप्त करना थोड़ा मुश्किल तो रहता ही है । इसीलिए इन प्रक्रियाओं पर विस्तार से चर्चा हो रही है । इनको गुरु का आशीर्वाद और वरिष्ठ गुरुभाईयों का स्नेह ही समझें जो हमें हमारे वरिष्ठ गुरुभाईयों से प्राप्त हुआ है, तो इस परंपरा को हम और आप मिलकर ही आगे बढ़ायेंगे :-)

इसी क्रम में आज हम इस तंत्र कर्म सिद्धि मंडल पूजन विधान को कैसे संपन्न करना है, उस पर चर्चा करेंगे । आप सोच रहे होंगे कि अब तक जितनी भी प्रक्रियायें हमने इस यंत्र पर करनी सीखी हैं, वो सब क्या पूजन के अंतर्गत नहीं आती हैं? तो, इसका जवाब है - नहीं ।
वो सब इस यंत्र का पूजन नहीं है, वो सब तो विभिन्न शक्तियों का इस यंत्र में स्थापन करना है, इस यंत्र के माध्यम से उन शक्तियों को अपने शरीर में भी स्थापित करना है और फिर आखिर में हमारे शरीर में स्थित शक्ति केंद्रों का संपर्क-सबंध इस यंत्र में मौजूद शक्तियों से कर देना है ताकि हममें और यंत्र में कोई भेद ही न रहे और हम जो भी साधना करें, वह हमारे इष्ट तक निर्बाध रूप से पहुंच सके और, हमारे जीवन का जो अभीष्ट है, वह हमें प्राप्त हो सके ।
पूजन विधान
वस्त्र व आसनः श्वेत रंग (सफेद रंग)
दिशाः ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा को ईशान कोण कहते हैं. यह दिशा बहुत पवित्र और शुभ मानी जाती है. मान्यता है कि इस दिशा में ईश्वर और देवी-देवताओं का वास होता है)
पूजन सामग्री में आप कुंकुम मिश्रित आधा किलो अक्षत (बिना टूटा हुआ चावल) की व्यवस्था पहले ही कर लें और जो भी सामान्य पूजन सामग्री और पुष्प, भोग इत्यादि हों, उनकी भली भांति व्यवस्था कर लें ।
संकल्पः दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें -
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ॐ अद्यब्रह्मणोSह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे, जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर - गांव का नाम) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीरविक्रमादित्यनृपते (वर्तमान संवत), तमेSब्दे क्रोधी नाम संवत्सरे उत्तरायणे (वर्तमान) ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे (वर्तमान) मासे (वर्तमान) पक्षे (वर्तमान) तिथौ (वर्तमान) वासरे (जो भी नक्षत्र हो) नक्षत्रे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोSहं अमुक साधकाहं (अपना नाम लें) मनेप्सित शांति कार्य सिद्धयर्थं अहं करिष्ये ।
इतना कहकर जल भूमि पर छोड़ दें ।
उपरोक्त संकल्प में जो भी जानकारी आपको चाहिए, वह पंचांग से आसानी से ज्ञात की जा सकती है ।
अब आप निम्न मंत्रों का उच्चारण करें और उच्चारण करते समय दाहिने हाथ से संबंधित अंग का स्पर्श करें -
ह्रीं पादाभ्याम नमः (दोनों पैर पर) hreem padabhyam namah
ह्रीं जानुभ्याम नमः (दोनों जंघा पर) hreem janubhyam namah
ह्रीं कटिभ्याम नमः (दोनों कमर पर) hreem katibhyam namah
ह्रीं नाभ्ये नमः (नाभि पर) hreem nabhye namah
ह्रीं हृदयाय नमः (हृदय पर) hreem hridayaay namah
ह्रीं बाहुभ्याम नमः (दोनों कंधे पर) hreem bahubhyam namah
ह्रीं कंठाय नमः (गले पर) hreem kanthay namah
ह्रीं मुखाय नमः (मुख पर) hreem mukhay namah
ह्रीं नेत्राभ्याम नमः (दोनों नेत्रों पर) hreem netrabhyam namah
ह्रीं ललाटाय नमः (ललाट पर) hreem lalatay namah
ह्रीं मुर्ध्ने नमः (मस्तक पर) hreem murdhne namah
ह्रीं त्रयी तत्वाय नमः (पूरे शरीर पर) hreem trayi tatvaay namah
अब निम्न मंत्रों के माध्यम से विभिन्न देवी - देवताओं को नमस्कार करें -
ह्रीं श्री गणेशाय नमः
ह्रीं इष्ट देवाताभ्यो नमः
ह्रीं कुल देवताभ्यो नमः
ह्री ग्राम देवताभ्यो नमः
ह्रीं स्थान देवताभ्यो नमः
ह्रीं सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः
ह्रीं गुरुवे नमः
ह्रीं मातृ पितृ चरमकमलेभ्यो नमः
चूंकि हमें शांति कर्म की साधना करनी है जिसके लिए सफेद रंग के वस्त्र का प्रयोग किया जाता है, उसे आप सामने बाजोट (चौकी) पर बिछा लें, उस पर तांबे का पात्र स्थापित कर लें और उस पर गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल को स्थापित कर लें ।
सर्वप्रथम भगवान गणपति का पूजन करें - हाथ में पुष्प लेकर भगवान गणपति का आवाहन करें ।
ॐ गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ : ऐं ह्रीं क्लीं
अब हाथ में पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान गणपति के सामने छोड़ दें -
गजाननंभूतगणादिसेवितं कपित्थ जंबू फल चारुभक्षणम् ।
उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम् ।।
अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये, थोड़े - थोड़े अक्षत के दाने गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल पर अर्पित करते जायें -
नवग्रह आवाहन -
अस्मिन् नवग्रहमंडले आवाहिताः सूर्यादिनवग्रहा देवाः सुप्रतिष्ठिता वरदा भवन्तु ।
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महदद्युतिम् । तमोरिंसर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम् ।।
ॐ ह्सौः श्रीं आं ग्रहाधिराजाय आदित्याय स्वाहा ।
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् । नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम् ।।
ॐ श्रीं क्रीं ह्रां चं चन्द्राय नमः ।
धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम् । कुमारे शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणाम्यहम् ।।
ऐं ह्सौः श्रीं द्रां कं ग्रहाधिपतये भौमाय स्वाहा ।
प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम् । सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् ।।
ॐ ह्रां क्रीं टं ग्रहनाथाय बुधाय स्वाहा ।
देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम् । बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् ।।
ॐ ह्रीं श्रीं ख्रीं ऐं ग्लौं ग्रहाधिपतये बृहस्पतये ब्रींठः ऐंठः श्रींठः स्वाहा ।
हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् । सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् ।।
ॐ ऐं जं गं ग्रहेश्वराय शुक्राय नमः ।
नीलांजन समाभासं रविपुत्र यमाग्रजम् । छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ।।
ॐ ह्रीं श्रीं ग्रहचक्रवर्तिने शनैश्चराय क्लीं ऐं सः स्वाहा ।
अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम् । सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् ।।
ॐ क्रीं क्रीं हूँ हूँ टं टंकधारिणे राहवे रं ह्रीं श्रीं भैं स्वाहा ।
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम् । रौद्रंरौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् ।।
ॐ ह्रीं क्रूं क्रूररूपीणे केतवे ऐं सौः स्वाहा ।
अब हाथ जोड़कर स्तुति करें -
ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशि भूमिसुतो बुधश्च गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः मुन्था सहिताय सर्वेग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ।।
अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये थोड़े - थोड़े अक्षत के दाने महायंत्र पर अर्पित करें -
षोडशमातृका आवाहन -
ॐ गौरी पद्मा शचीमेधा सावित्री विजया जया । देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोकमातरः ।।
धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्टिरात्मनः कुलदेवताः । गणेशेनाधिका ह्येता वृद्धौ पूज्याश्च षोडशः ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः षोडशमातृकाभ्यो नमः ।।
इहागच्छ इह तिष्ठ ।
अब हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये यंत्र पर कुंकुम मिश्रित अक्षत डालें -
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते ।।
अनयां पूजयां गौर्मादि षोडश मातः प्रीयन्तां न मम ।
कलश पूजन
हाथ में पुष्ट लेकर वरुणदेव का आवाहन करें -
अस्मिन कलेश वरुणं सांगंं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि,
ॐ भूर्भुवः स्वः भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ स्थापयामि पूजयामि ।।
तत्पश्चात आप जिस तिथि में पूजन या साधना कर रहे हैं, उस तिथि स्वामी के मंत्र की 1 माला कर लें । तिथि और उनके स्वामी मंत्र सहित इस लेख के आखिर में दिये गये हैं ।
तत्पश्चात जिस नक्षत्र में आप अपने पूजन या साधना को संपन्न कर रहे हैं, उस नक्षत्र के स्वामी के मंत्र की 1 माला जप करें । इसका भी वर्णन आपको लेख के आखिर में मिल जाएगा ।
अब हाथ जोड़कर हाथ में पुष्प लेकर शांति कर्म की अधिष्ठात्री देवी, रति का ध्यान करें और ध्यान मंत्र के उच्चारण के बाद उस पुष्प को यंत्र पर अर्पित कर दें -
रति ध्यान मंत्र (शांति कर्म के लिए)
कुंकुमोदरगर्भाभां किन्चित्यौवन शालिनीम् । मृणालकोमलभुजां केयुरां गद्भूषितां ।।
नीलोत्पल दृशम् किन्चिदुद्यत्कुच विराजिताम् । भजेSहं भ्राम्यकमलवराभय समंविताम् ।।
रक्तवस्त्र परिधानाम् ताम्बलाधर पल्लवाम । हेम प्राकारमध्यस्थां रत्नसिंहासनोपरि ।।
इसके बाद यंत्र में रति शक्ति की प्रतिष्ठा करें, हाथ में अक्षत लेकर निम्न मंत्र उच्चारित करें -
ॐ भूर्भुवः स्वः रति शक्ति इहागच्छ इह तिष्ठ,
ऐतानि पाद्याद्याचमनीय - स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ।
आसन
आसनार्थेपुष्पाषिसमर्पयामि ।
आसन के लिए फूल चढ़ायें ।
पाद्य
ॐ रति शक्ति नमः पादयोः पाद्यंसमर्पयामि ।
जल चढ़ायें ।
यंत्र के सामने भोग अर्पित करें
हाथ में अक्षत लेकर निम्न मंत्र का 11 बार मंत्रोच्चारण करें -
ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टि वर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।
तत्पश्चात गुरु मंत्र की 5 माला जप करें और उसके बाद ही, महाकाल तंत्र सिद्धि माल्य से 5 माला अपनी अभीष्ट शक्ति मंत्र (शांति कर्म) की करें -
।। ह्रीं रत्यै नमः ।।
Hreeng Ratyai Namah
मंत्र जप करने के बाद अपना मंत्र सदगुरुदेव या शक्ति के चरणों में निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये अर्पित कर दें -
गुह्याति गुह्य गोप्ती त्वं ग्रहाणास्मत कृतं जपं । सिद्धिर्भवतु में देवी त्वं प्रसाद परमेश्वरी ।।
अनेन यथाशक्ति जप कर्मणा रति शक्ति सांगां सपरिवारा सायुधा सशक्तिका प्रियन्ताम् नमः ।।
अब हाथ जोड़कर आद्य शक्ति से क्षमा याचना करें - ये देव्यपराधक्षमापन स्तोत्रम् है और इसकी रचना आद्य गुरु शंकराचार्य जी ने की थी । देवी के भक्तों के लिए इससे बड़ा कोई स्तोत्र नहीं है :-)
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातदनुसरणं क्लेशहरणम्।।1।।
विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वा तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्।
तदेतत् क्षंतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।2।।
पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:
परं तेषां मध्ये विरलतरलोSहं तव सुत:।
मदीयोSयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।3।।
जगन्मातर्मातव तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरूपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।4।।
परित्यक्तादेवा विविध सेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि
इदानीं चेन्मातः तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्।।5।।
श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै:।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ।।6।।
चिताभस्मा लेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्।।7।।
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन:।
अतस्त्वा संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत:।।8।।
नाराधितासि विधिना विविधोपचारै: किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभि:।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमंब परं तवैव।।9।।
आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे कणार्णवेशि। नैतच्छदत्वं मम भावयेथा: क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति।।10।।
जगदंब विचित्रमत्र किं परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि। अपराधपरंपरावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम्।।11।।
मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा नहि।
एवं ज्ञात्वा महादेवी यथायोग्यं तथा कुरु ।।
इति देव्पराधक्षमापन् स्तोत्रम संपूर्णम्।
ये स्तोत्र उच्चारण करने में थोड़ा सा कठिन है । लेकिन अगर आप इसे सदगुरुदेव महाराज की वाणी में सुनना प्रारंभ कर दें तो कुछ ही समय में इसका उच्चारण बहुत आसान और स्पष्ट हो जाता है । मैं इस स्तोत्र की यूट्यूब की लिंक यहां शेयर कर रहा हूं - आप इसे 13 वें मिनट और 12 सेंकड के बाद से 17 मिनट 28 सेकंड तक इसकी रिकॉर्डिंग आप सुन सकते हैं । मात्र 4 मिनट के इस स्तोत्र के पाठ से जीवन में अपूर्व शांति प्राप्त होती है ।
तिथि एवं नक्षत्रों के स्वामी एवं उनके मंत्र
नक्षत्र | देवता | मंत्र |
अश्वनी | अश्विनी | ।। ह्रीं अश्विनीकुमाराय नमः ।। |
भरणी | काल | ।। ह्रीं कालाय नमः ।। |
कृतिका | अग्नि | ।। ह्रीं अग्नये नमः ।। |
रोहिणी | ब्रह्मा | ।। ह्रीं ब्रह्मणे नमः ।। |
मृगशिरा | चंद्रमा | ।। ह्रीं चन्द्रमसे नमः ।। |
आर्दा | रुद्र | ।। ह्रीं रुद्राय नमः ।। |
पुनर्वसु | अदिति | ।। ह्रीं अदिति देव्यै नमः ।। |
पुष्य | बृहस्पति | ।। ह्रीं ब्रहस्पतये नमः ।। |
श्लेषा | सूर्य | ।। ह्रीं सूर्याय नमः ।। |
मघा | पितृ | ।। ह्रीं पितृभ्यो नमः ।। |
पूर्वा फाल्गुनी | भग | ।। ह्रीं भगाय नमः ।। |
उत्तरा फाल्गुनी | अर्यमा | ।। ह्रीं अर्यमाय नमः ।। |
हस्त | रवि | ।। ह्रीं रवये नमः ।। |
चित्रा | विश्वकर्मा | ।। ह्रीं विश्वकर्माये नमः ।। |
स्वाति | वायु | ।। ह्रीं वायु देवाय नमः ।। |
विशाखा | शुक्र अग्नि | ।। ह्रीं शुक्र सहिताय अग्नये नमः ।। |
अनुराधा | मित्र | ।। ह्रीं मित्राय नमः ।। |
ज्येष्ठा | इन्द्र | ।। ह्रीं इन्द्राय नमः ।। |
मूल | निऋति | ।। ह्रीं निऋत्ये नमः।। |
पूर्वाषाढ़ा | जल | ।। ह्रीं जलदेवताय नमः ।। |
उत्तराषाढ़ा | विश्वदेव | ।। ह्रीं विश्वदेवाय नमः ।। |
श्रवण | विष्णु | ।। ह्रीं विष्णवे नमः ।। |
धनिष्ठा | वसु | ।। ह्रीं वसुवे नमः ।। |
शतभिषा | वरुण | ।। ह्रीं वरुणाय नमः ।। |
पूर्वभाद्र | अजैकपाद | ।। ह्रीं अजैकपादाय नमः ।। |
उत्तर भाद्रपद | अहिर्बुध्न्य | ।। ह्रीं अहिर्बुधन्ये नमः ।। |
रेवती | पूषा | ।। ह्रीं पूषाय नमः ।। |
यदि आप अभिजीत मुहुर्त में प्रयोग संपन्न कर रहे हैं तब उनके स्वामी ब्रह्मा हैं । इस बात का ध्यान रखना चाहिए ।
इसी प्रकार विशिष्ट पूजन में निर्दिष्ट स्थान पर तिथि स्वामी के मंत्र की भी एक माला संपन्न करनी चाहिए -
तिथि | स्वामी | मंत्र |
प्रतिपदा | अग्नि | ।। रं अग्नये नमः ।। |
द्वितीय | ब्रह्मा | ।। ब्रं ब्रह्मणे नमः ।। |
तृतीया | गौरी | ।। क्लीं गौर्यै नमः ।। |
चतुर्थी | गणेशजी | ।। गं गणपतये नमः ।। |
पंचमी | शेषनाग | ।। शं शेषनागाय नमः ।। |
षष्ठी | कार्तिकेय | ।। ङ कुमाराय नमः ।। |
सप्तमी | सूर्य | ।। ॐ ह्रीं हंसः ।। |
अष्टमी | शिव | ।। ह्रौं शिवाय नमः ।। |
नवमी | दुर्गा | ।। ह्रीं दुं दुर्गायै नमः ।। |
दशमी | काल | ।। कं कालाय नमः ।। |
एकादशी | विश्वदेव | ।। ह्रीं विश्वदेवाय नमः ।। |
द्वादशी | विष्णु | ।। ह्रीं विष्णवे नमः ।। |
त्रयोदशी | कामदेव | ।। क्लीं कामदेवाय नमः ।। |
चतुर्दशी | शिव | ।। ह्रौं शिवाय नमः ।। |
पूर्णिमा | चंद्रमा | ।। सौं सोमाय नमः ।। |
अमावस्या | पितृ | ।। ह्रीं पितृभ्यो नमः ।। |
इस प्रकार से आप गुरु सायुज्य तंत्र कर्म सिद्धि मंडल का पूजन विधान संपन्न कर सकते हैं । इस विधान को मूल रूप से तब संपन्न किया जाता है जब आप शांति कर्म से जुड़े हुये महाशांति विधान का प्रयोग करते हैं ।
आप सभी भाई बहन तंत्र की इन उच्च कोटि की क्रियाओं को संपन्न कर सकें ताकि आपके जीवन में महाशांति साधना विधान को पूर्ण विधि विधान से करने का रास्ता प्रशस्त हो सके, ऐसी ही सदगुरुदेव महाराज के श्रीचरणों में मेरी प्रार्थना है ।
सदुगुरुदेव महाराजा आप सभी का कल्याण करें ।
अस्तु ।
यंत्र विशेषांक के अगले एवं आखिरी लेख में तंत्र सिद्धि माला के विधान पर चर्चा की जाएगी :-)
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